रुपया 95 के पार|तेल की आग और FII की उड़ान
कच्चे तेल का झटका
5 मई को भारतीय बाज़ार में कुछ अजीब हुआ। बंगाल में भाजपा की जीत की खुशी बाज़ार में महज़ कुछ घंटे टिकी। सेंसेक्स 700 अंक गिरा और रुपया 95.40 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुँच गया — यह उसी दिन हुआ जब चुनावी नतीजे "बाज़ार के लिए सकारात्मक" बताए जा रहे थे।
विरोधाभास की जड़ ईरान की खाड़ी में है। अमेरिका-ईरान के बीच नए टकराव ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य को दोबारा खतरे में डाल दिया। ब्रेंट क्रूड $112 प्रति बैरल तक चला गया। भारत अपनी कच्चे तेल की 85% से ज़्यादा ज़रूरत आयात से पूरी करता है — तो हर $10 की बढ़त सीधे व्यापार घाटे को चौड़ा करती है और रुपये पर दबाव डालती है।
इराक ने Basrah Medium क्रूड पर $33 प्रति बैरल की छूट दी — लेकिन शर्त यह है कि माल होर्मुज़ से होकर आए। खरीदार वही जोखिम उठाएगा जिससे बाज़ार पहले से डरा हुआ है। नतीजा: छूट कागज़ी है, असली आपूर्ति संकट बरकरार है।
IOC, BPCL और HPCL पेट्रोल-डीज़ल के दाम 4 साल से नहीं बढ़ा पाईं। अभी प्रति लीटर 25-28 रुपये का नुकसान हो रहा है। Fitch ने चेताया कि अगर यह स्थिति लंबी चली तो इन कंपनियों का कैश फ्लो टूट सकता है। सरकार ने साफ़ कह दिया — राहत का कोई प्रस्ताव नहीं है। तेल कंपनियाँ खुद झेलें।
यहाँ जो धागा छूट जाता है वह यह है: अगर सरकार ने पेट्रोल दाम बढ़ाए तो महँगाई भड़केगी। अगर नहीं बढ़ाए तो सरकारी तेल कंपनियाँ कमज़ोर होती रहेंगी। यह दोनों रास्ते अगले अध्याय में मिलते हैं — रिज़र्व बैंक की दुविधा में।
रुपया और RBI की दुविधा
रुपये की गिरावट सिर्फ़ तेल की कहानी नहीं है। यह उसका नतीजा है — पर कारण गहरा है। 2026 में FII ने भारतीय इक्विटी से ₹2 लाख करोड़ से ज़्यादा निकाल लिए हैं। यह पूरे 2025 की बिकवाली के बराबर है।
ये पैसे गए कहाँ? Taiwan और South Korea — AI और सेमीकंडक्टर की लहर पर सवार। MSCI EM में भारत का वजन सितंबर 2024 के 21% से घटकर अब 12% हो गया है — लगभग COVID के स्तर पर। ताइवान 25% के साथ पहले नंबर पर आ गया है।
RBI के पास $698 अरब का रिज़र्व है — लेकिन बाज़ार के जानकार कह रहे हैं कि केंद्रीय बैंक $95 को "लक्ष्मण रेखा" नहीं मानता। SMBC और MUFG के विशेषज्ञों के मुताबिक RBI का असली इरादा गिरावट की रफ़्तार धीमी करना है — न कि ट्रेंड से लड़ना।
RBI के सामने विकल्प हैं: FCNR(B) डिपॉज़िट फिर से शुरू करना, जैसा 2013 के "टेपर टैंट्रम" में हुआ था — तब $30 अरब आए थे। या विदेशी निवेशकों के लिए कैपिटल गेन टैक्स में छूट। दोनों में से कोई भी अभी लागू नहीं हुआ है।
Standard Chartered ने GDP अनुमान 7.1% से घटाकर 6.4% किया — $90 तेल के आधार पर। UBS ने 6.2% किया — $100 के आधार पर। तेल $112 पर है। यानी असली गिरावट इन अनुमानों से भी नीचे जा सकती है।
अब RBI की दुविधा यह है: ब्याज दर घटाओ तो महँगाई बढ़ेगी और रुपया और कमज़ोर होगा। बढ़ाओ तो विकास थमेगा। UBS को लगता है कि FY27 के दूसरे हिस्से में RBI दर बढ़ाने को मजबूर होगा — यह उम्मीद अगले कुछ हफ्तों में सरकारी बॉन्ड यील्ड में दिखेगी।
घरेलू शक्ति की असली परीक्षा
इस पूरे तूफ़ान में एक उलट तस्वीर है। M&M ने Q4FY26 में मुनाफ़ा 42% बढ़ाकर ₹4,667 करोड़ किया। SUV मार्केट शेयर 24.5% और ट्रैक्टर बिलिंग FY26 में 5 लाख के पार — दोनों रिकॉर्ड। कंपनी ने ₹33 प्रति शेयर डिविडेंड घोषित किया। यह घरेलू मांग की मज़बूती का सबूत है।
अप्रैल में ऑटो रिटेल सेल्स 12.9% बढ़कर 26.1 लाख यूनिट तक पहुँचीं। DII ने 2026 में ₹3 लाख करोड़ से ज़्यादा इक्विटी में लगाए हैं। FII की बिकवाली के बावजूद बाज़ार टूटा नहीं — Nifty 50 अभी भी 24,000 के ऊपर है।
लेकिन यही असली सवाल है: घरेलू निवेशकों की यह ख़रीदारी कब तक टिकेगी — अगर महँगाई और RBI रेट हाइक एक साथ आएं?
SIP का पैसा हर महीने आता रहेगा — यह structural है। पर अगर CPI 5% के ऊपर जाती है और RBI दर बढ़ाता है, तो EMI बढ़ेगी, कंज़म्प्शन घटेगी, और Q1FY27 के आँकड़े कमज़ोर आ सकते हैं।
तेल की कीमत यहाँ से दिशा तय करेगी। अगर होर्मुज़ पर तनाव कम होता है और ब्रेंट $95 के नीचे आता है, तो रुपये को राहत मिलेगी, FII वापसी की संभावना बनेगी, और UBS-Standard Chartered के अनुमान गलत साबित होंगे। अगर तेल $115 के पार गया और रुपया $96 तोड़ा, तो RBI के पास कोई आसान विकल्प नहीं बचेगा।
कल के लिए दो संकेत देखने लायक हैं: रुपया $95.50 के ऊपर रहता है या नीचे आता है — और 10-year सरकारी बॉन्ड यील्ड 7% पार करती है या नहीं। ये दोनों मिलकर RBI के अगले कदम की भाषा बोलेंगे। M&M की मज़बूती बताती है कि भारत की घरेलू अर्थव्यवस्था में दम है — पर होर्मुज़ की चौड़ाई 33 किलोमीटर है, और उसमें से अभी भी दुनिया का 20% तेल गुज़रता है।