BSE लिमिटेड 30x प्रीमियम|NSE IPO रोडशो से सेक्टर उलटफेर?

· NIFTY

BSE का 30x सफर और NSE रोडशो की दस्तक

BSE लिमिटेड ने 2017 की लिस्टिंग के बाद से 30 गुना से ज्यादा रिटर्न दिया है। यह रिटर्न केवल BSE की ग्रोथ का नहीं, बल्कि उस 'मोनोपॉली प्रीमियम' का नतीजा था जो NSE के अनलिस्टेड रहने से बना था।

लेकिन यहाँ एक विरोधाभास है जो बाजार अभी पूरी तरह पचा नहीं पाया। NSE का कुल रेवेन्यू FY26 में 3 प्रतिशत गिरा — डेरिवेटिव्स पर नियामक अंकुश के कारण। उसी साल BSE का रेवेन्यू 88 प्रतिशत उछला। एक ही सेक्टर, एक ही नियामक माहौल, लेकिन दो बिल्कुल उलटी कहानियाँ।

और अब 10 जुलाई की Reuters रिपोर्ट ने वह ट्रिगर खींचा जिसका BSE होल्डर्स को डर था। NSE 17 जुलाई से 30 से ज्यादा वैश्विक निवेशकों को ₹30,000 करोड़ के IPO का पिच करने वाला है। सवाल अब यह नहीं रहा कि NSE लिस्ट होगा या नहीं — सवाल यह है कि यह लिस्टिंग BSE के लिए अवसर है या खतरा।

NSE की ताकत और BSE का असली दांव

Jefferies की रिपोर्ट जो 7 जुलाई को सामने आई, वह NSE की असली ताकत उजागर करती है। कैश मार्केट में NSE का 93 प्रतिशत शेयर है, इक्विटी फ्यूचर्स में शत-प्रतिशत। NSE भारत के 70 प्रतिशत एक्सचेंज रेवेन्यू पर काबिज है — BSE का हिस्सा मात्र 30 प्रतिशत।

लेकिन NSE का 3 प्रतिशत रेवेन्यू गिरावट भ्रामक है। Jefferies के अनुसार, NSE का नॉर्मलाइज्ड EBITDA मार्जिन FY24 से FY26 के बीच 76-77 प्रतिशत पर स्थिर रहा। FY26 में ₹1,390 करोड़ का को-लोकेशन प्रोविजन और ₹670 करोड़ का TAP मैटर पेमेंट — ये एक-बारगी नियामक खर्चे थे जिन्होंने रिपोर्टेड प्रॉफिट को दबाया।

यहाँ वह बिंदु है जिसे बाजार अनदेखा कर रहा है। BSE का हालिया 88 प्रतिशत रेवेन्यू उछाल मुख्यतः इक्विटी ऑप्शंस सेगमेंट से आया — जहाँ BSE का शेयर महज 7 प्रतिशत है और NSE का 75 प्रतिशत। NSE के पास ₹28,800 करोड़ के निवेश संपत्ति हैं और वह FY26 में 85 प्रतिशत डिविडेंड पे-आउट करता है। जब यह खजाना बाजार में आएगा, तो BSE की तुलना में NSE का वैल्यूएशन कहाँ ठहरेगा?

और अगर यह काफी नहीं था — NSE ने निवेशकों को बताया कि कमोडिटी डेरिवेटिव्स में 10 प्रतिशत सालाना बाजार वृद्धि की उसकी योजना है। यानी NSE अब MCX की ओर भी बढ़ रहा है, जहाँ MCX का अब तक एकाधिकार रहा। BSE के लिए यह दोहरा संकट है — ऊपर से NSE का वैल्यूएशन दबाव और साइड से MCX-जैसे विस्तार का खतरा।

BSE होल्डर और वॉचलिस्ट निवेशक का निर्णय-बिंदु

सेक्टर के बुल केस को खारिज नहीं किया जा सकता। NSE के DRHP में ही लिखा है — भारत में 22.45 करोड़ डीमैट अकाउंट हैं, जो 2021 के मुकाबले चार गुना। लेकिन वयस्क आबादी का केवल 13.45 प्रतिशत ही निवेशक है, जबकि अमेरिका में ETF AUM अकेला GDP का 43.47 प्रतिशत है। यह runway BSE और NSE दोनों के लिए उपलब्ध है।

लेकिन यहाँ दोनों दिशाओं की संभावना बराबर है। एक दृष्टिकोण यह है कि NSE की लिस्टिंग पूरे एक्सचेंज सेक्टर को ग्लोबल पीर मल्टीपल पर री-रेट करेगी — BSE को भी साथ खींचेगी। दूसरा दृष्टिकोण: BSE की 30x चढ़ाई का एक बड़ा हिस्सा 'एकमात्र लिस्टेड एक्सचेंज' प्रीमियम था, जो NSE के आते ही खत्म होगा।

BSE होल्डर के लिए एकमात्र checkable variable यह है: जब NSE का अनुमानित वैल्यूएशन मल्टीपल (P/E और P/B) सार्वजनिक हो, तो BSE उसके सापेक्ष कहाँ ट्रेड करता है। अगर BSE NSE के मल्टीपल से 30 प्रतिशत से ज्यादा डिस्काउंट पर आ जाए — तो यह री-रेटिंग का मौका है, sector uplift की पुष्टि। अगर BSE प्रीमियम पर बना रहे NSE के relative size के बावजूद — तो 'एकमात्र एक्सचेंज प्ले प्रीमियम' का कटना अभी बाकी है और BSE एक ट्रैप बन सकता है। वॉचलिस्ट निवेशक के लिए ट्रिगर साफ है: NSE IPO की grey market pricing या anchor investor valuation — जो सितंबर listing से पहले सामने आएगी।

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