Hormuz Crisis Hits India|OMC losses or fuel hike next?

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होर्मुज़ का असर

शुक्रवार को सेंसेक्स 516 अंक गिरा और निफ्टी 24,200 के नीचे बंद हुआ — लेकिन असली सवाल ये नहीं है कि बाज़ार कितना गिरा। असली सवाल ये है कि जब अमेरिका-ईरान युद्धविराम कागज़ पर मौजूद है, तो ब्रेंट क्रूड दोबारा 101 डॉलर प्रति बैरल पर क्यों पहुंच गया।

गुरुवार को बाज़ार में राहत थी — होर्मुज़ समझौते की उम्मीद ने क्रूड को 96 डॉलर तक खींच लिया था। लेकिन रात में अमेरिकी नौसेना ने ईरानी ठिकानों पर जवाबी हमले किए। ईरान ने कहा कि यह युद्धविराम का उल्लंघन है। तेल तुरंत उछला।

होर्मुज़ जलडमरूमध्य वैश्विक तेल आपूर्ति का 20 प्रतिशत वहन करता है। फरवरी 28 से पहले ब्रेंट 72 डॉलर पर था। आज वह 101 डॉलर पर है — यानी 40 प्रतिशत की बढ़त सिर्फ दो महीनों में। IEA ने चेतावनी दी है कि इस युद्ध से रोज़ाना 1.4 करोड़ बैरल की आपूर्ति बाधित हो रही है।

भारतीय बाज़ार इस झटके को सीधे महसूस कर रहा है। रुपया 94.58 तक गिरा, जो दो दिन की रिकवरी को एक झटके में मिटा गया। FII लगातार बिकवाल हैं। बैंकिंग सेक्टर पर सबसे ज़्यादा दबाव आया — Nifty PSU Bank 2.6 प्रतिशत टूटा। SBI के शेयर 6.6 प्रतिशत गिरे। लेकिन बैंकों की गिरावट का असली कारण SBI के नतीजे नहीं थे — वह तो एक बहाना था। असली कारण वह था जो IOC, BPCL और HPCL की बैलेंस शीट में छुपा है।

₹30,000 करोड़ का बोझ

यह OMC संकट बाज़ार की नज़रों से अभी तक ओझल है — लेकिन यह वही धागा है जो अगले महीने मुद्रास्फीति की सूई को हिला सकता है।

फरवरी 28 से सरकारी तेल कंपनियों ने पेट्रोल और डीज़ल के दाम नहीं बढ़ाए। बाज़ार में क्रूड उछला, लागत बढ़ी — लेकिन पंप पर कीमत नहीं बदली। इस अंतर को "अंडर-रिकवरी" कहते हैं, और अब तक यह ₹30,000 करोड़ तक पहुंच चुका है।

अगर सरकार ने एक्साइज ड्यूटी न काटी होती, तो यह नुकसान ₹62,500 करोड़ होता। पेट्रोल पर ₹13 से घटाकर ₹3 प्रति लीटर और डीज़ल पर ₹10 से शून्य — यही बफर था। अप्रैल में रोज़ाना OMC घाटा ₹600 से ₹700 करोड़ के बीच था।

IOC, BPCL और HPCL के लिए यह स्थिति टिकाऊ नहीं है। अगर क्रूड 100 डॉलर से ऊपर बना रहा, तो या तो सरकार को और सब्सिडी देनी होगी — जो राजकोषीय घाटे को दबाव देगी — या कीमतें बढ़ानी होंगी। रॉयटर्स के एक सर्वे के अनुसार अप्रैल में उपभोक्ता मुद्रास्फीति 3.8 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जो ऊंचे ईंधन लागत के असर से है। अगर पंप कीमतें भी बढ़ीं, तो यह 4 प्रतिशत के पार जा सकती है।

RBI के लिए यह सिग्नल महत्वपूर्ण है। ब्याज दर में कटौती की उम्मीद रखने वाले निवेशकों को अब एक अलग सवाल पूछना चाहिए — क्या RBI दर घटा सकेगा अगर महंगाई बढ़ रही हो? यही वह शर्त है जो डेट बाज़ार को अस्थिर कर सकती है। 10-वर्षीय बॉन्ड यील्ड पहले ही 6.93 प्रतिशत पर चढ़ चुकी है।

आगे का रास्ता

दोनों धागे — होर्मुज़ की अनिश्चितता और OMC का घाटा — एक ही नोड पर मिलते हैं: ब्रेंट क्रूड का स्तर।

अगर अमेरिका-ईरान वार्ता आगे बढ़ती है और होर्मुज़ खुलता है, तो क्रूड 90 डॉलर के नीचे आ सकता है। उस स्थिति में OMC घाटा कम होगा, रुपया 93.80 की ओर मजबूत होगा, और RBI के पास दर घटाने की गुंजाइश बनेगी। निफ्टी के लिए 24,400 का स्तर वह दरवाज़ा है जिसके ऊपर बुलिश मोमेंटम लौट सकता है।

लेकिन अगर संघर्ष जारी रहा और क्रूड 100 डॉलर से ऊपर बना रहा, तो सरकार पर दबाव बढ़ेगा कि वह OMC को राहत दे या दाम बढ़ाने की अनुमति दे। दोनों में से कोई भी विकल्प आसान नहीं। राजकोषीय लागत बढ़ेगी, महंगाई बढ़ेगी, और बाज़ार में 23,800-23,950 का सपोर्ट ज़ोन परखा जाएगा।

इस समय का झुकाव सतर्कता की तरफ है। होर्मुज़ की स्थिति हर दिन बदल रही है — और बाज़ार प्रत्येक हेडलाइन पर प्रतिक्रिया दे रहा है। जो निवेशक इस दौर में सही दांव लगाना चाहते हैं, उनके लिए एक सरल बेंचमार्क है: अगर कल ब्रेंट क्रूड 97 डॉलर के नीचे बंद हो और रुपया 94 के पार मजबूत हो, तो रिकवरी की शुरुआत मानी जा सकती है। अगर ये दोनों नहीं हुए — तो फरवरी 28 वाली कहानी अभी खत्म नहीं हुई है।

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