NSE IPO 5 लाख करोड़|BSE से 6x प्रीमियम 10 साल बाद DRHP
अध्याय 1: दस साल की प्रतीक्षा — को-लोकेशन से DRHP तक
भारत का सबसे बड़ा स्टॉक एक्सचेंज अब खुद लिस्ट होने की तैयारी में है।
नेशनल स्टॉक एक्सचेंज, यानी NSE, 15 या 16 जून 2026 को SEBI के पास अपना ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस दाखिल करने वाला है।
यह खबर सुनने में सरल लगती है। लेकिन इसके पीछे एक दशक की कानूनी लड़ाई है।
NSE ने पहली बार 2016 में IPO की कोशिश की थी। उस समय कंपनी ने SEBI के पास ऑफर फॉर सेल के जरिए करीब दस हजार करोड़ रुपये जुटाने की योजना बनाई थी।
लेकिन SEBI ने मंजूरी नहीं दी।
कारण था को-लोकेशन विवाद। इस मामले में कुछ ब्रोकर्स को NSE के ट्रेडिंग सिस्टम तक अनुचित प्राथमिकता पहुंच मिलने का आरोप था। सवाल सीधा था — क्या जो एक्सचेंज दूसरों के लिए बाजार चलाता है, वह खुद पारदर्शी है?
यह विवाद वर्षों तक चलता रहा।
NSE ने 2025 में सेटलमेंट आवेदन दाखिल किया। कंपनी ने 1,388 करोड़ रुपये चुकाने की पेशकश की।
जनवरी 2026 में SEBI के अध्यक्ष तुहिन कांता पांडे ने घोषणा की कि इस सेटलमेंट को सैद्धांतिक मंजूरी दी गई है।
उसी महीने NSE को नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट मिला।
फरवरी 2026 में NSE के बोर्ड ने औपचारिक रूप से IPO को मंजूरी दी।
और अब जून 2026 में DRHP दाखिल होने वाला है।
यह सिर्फ एक कंपनी का IPO नहीं है। यह भारतीय पूंजी बाजार के इतिहास में एक नया अध्याय है।
यह प्रस्तावित IPO पूरी तरह ऑफर फॉर सेल है। इसका मतलब यह है कि NSE को एक भी रुपया नहीं मिलेगा। मौजूदा निवेशक अपनी हिस्सेदारी बेचेंगे।
NSE के सबसे बड़े शेयरधारकों में LIC है जिसकी 10.72 प्रतिशत हिस्सेदारी है। SBI और SBI कैपिटल मिलकर करीब 7.5 प्रतिशत रखते हैं। विदेशी निवेशकों में सिंगापुर के Temasek की सहायक Aranda Investments और कनाडा पेंशन प्लान इन्वेस्टमेंट बोर्ड शामिल हैं।
NSE के पास करीब 1.8 लाख शेयरधारक हैं। अनलिस्टेड बाज़ार में इसका मूल्यांकन 5 लाख करोड़ रुपये से अधिक आंका जा रहा है।
बाज़ार में इस खबर का असर पहले से दिखने लगा है। IFCI का शेयर 12 जून 2026 को 20 प्रतिशत उछलकर 52 सप्ताह के उच्चतम स्तर 84.57 रुपये पर पहुंच गया। IFCI की सहायक कंपनी SHCIL के पास NSE में 4.4 प्रतिशत हिस्सेदारी है। बाज़ार ने तुरंत इस परोक्ष संबंध की कीमत लगानी शुरू कर दी।
लेकिन अब असली सवाल पर आते हैं — क्या यह मूल्यांकन उचित है?
अध्याय 2: ₹5 लाख करोड़ का मूल्यांकन — BSE से 6x प्रीमियम का तर्क और जोखिम
NSE का अनलिस्टेड बाज़ार में मूल्यांकन 5 लाख करोड़ रुपये से अधिक है।
इसे समझने के लिए BSE से तुलना ज़रूरी है।
BSE पहले से लिस्टेड है। जून 2026 में BSE का बाज़ार पूंजीकरण करीब 80 हजार करोड़ रुपये के आसपास है।
NSE का संभावित मूल्यांकन BSE से लगभग 6 गुना अधिक है।
क्या यह न्यायसंगत है?
तर्क हां में: NSE भारत के कुल इक्विटी ट्रेडिंग वॉल्यूम का करीब 90 प्रतिशत नियंत्रित करता है। Nifty 50 एक वैश्विक बेंचमार्क बन चुका है। दुनिया भर के डेरिवेटिव बाज़ार में NSE के इंडेक्स का इस्तेमाल होता है।
इसके अलावा NSE की डेरिवेटिव मार्केट हिस्सेदारी लगभग एकाधिकार जैसी है। F&O सेगमेंट में NSE का दबदबा ऐसा है जिसे BSE चुनौती नहीं दे सका।
यह सिर्फ एक बाज़ार नहीं, यह एक बुनियादी ढांचा है जिसे बदलना लगभग असंभव है।
लेकिन यहां वह धारणा है जिसे बाज़ार मान कर चल रहा है — लेकिन जिसे जांचना ज़रूरी है।
बाज़ार मान रहा है कि NSE की डेरिवेटिव फ्रेंचाइज़ी अजेय है। लेकिन SEBI ने हाल के महीनों में F&O लॉट साइज़ और एक्सपायरी नियमों में बड़े बदलाव किए हैं। इन बदलावों का NSE की रेवेन्यू संरचना पर असर अभी पूरी तरह नहीं दिखा है।
अगर SEBI आगे और नियामक बदलाव करता है, तो 5 लाख करोड़ का मूल्यांकन किस आधार पर टिकेगा?
दूसरा जोखिम है OFS संरचना का संकेत।
जब कोई IPO पूरी तरह OFS होता है और कंपनी को कुछ नहीं मिलता — तो यह एक संकेत होता है कि बड़े निवेशक उच्च मूल्यांकन पर निकलना चाहते हैं।
LIC की 10.72 प्रतिशत हिस्सेदारी को अगर आंशिक रूप से भी बेचा जाए तो यह 53,000 करोड़ रुपये से अधिक होगी। SBI और अन्य मिलकर अरबों रुपये निकाल सकते हैं।
यह वितरण किसके खर्च पर होगा? खुदरा और संस्थागत निवेशकों के खर्च पर जो IPO में आवेदन करेंगे।
तीसरा मुद्दा है बाज़ार में नकदी का प्रभाव।
अगर IPO का आकार 22 से 25 हजार करोड़ रुपये है, तो यह बाज़ार से बड़ी मात्रा में नकदी खींच लेगा। इसी समय Jio Platforms का IPO भी आने की चर्चा है।
दो मेगा IPO एक साथ — यह बाज़ार की तरलता पर दोहरा दबाव होगा।
अब BSE के निवेशकों के लिए एक छुपा हुआ सवाल है।
अगर NSE लिस्ट होता है और निवेशक उसे खरीदते हैं — तो क्या BSE की मांग घटेगी? या NSE के IPO का उत्साह पूरे एक्सचेंज सेक्टर को री-रेट करेगा और BSE को भी फायदा होगा?
इन दोनों नज़रियों में से कौन सा सही है — यह अभी अनुत्तरित है। और यही इस वीडियो का केंद्रीय तनाव है।
अध्याय 3: DRHP 15 जून के बाद — तीन तरह के निवेशकों के लिए तीन अलग सवाल
DRHP 15 या 16 जून को दाखिल होने की उम्मीद है।
लेकिन DRHP दाखिल होना IPO की शुरुआत है, अंत नहीं।
DRHP दाखिल होने के बाद SEBI इसकी समीक्षा करेगा। इसमें आमतौर पर 30 से 75 दिन लगते हैं। उसके बाद प्राइस बैंड तय होगा। फिर सब्सक्रिप्शन विंडो खुलेगी।
यानी वास्तविक IPO सितंबर या अक्टूबर 2026 में आने की संभावना है।
अभी आपके सामने तीन तरह की स्थितियां हो सकती हैं।
पहली स्थिति — आप NSE के शेयरधारक नहीं हैं और IPO में आवेदन करना चाहते हैं।
आपके लिए सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज़ DRHP है। उसमें देखें — रेवेन्यू की संरचना क्या है? F&O सेगमेंट से कितना आता है? नियामक जोखिम कैसे बताए गए हैं? प्राइस-टु-अर्निंग्स रेशियो BSE की तुलना में कहां है?
5 लाख करोड़ का मूल्यांकन और प्राइस बैंड के बीच का अंतर ही बताएगा कि निवेश उचित है या नहीं।
दूसरी स्थिति — आप BSE के मौजूदा निवेशक हैं।
BSE का शेयर NSE IPO घोषणा से पहले और बाद में कैसे चलता है — यह देखना ज़रूरी है। अगर बाज़ार NSE IPO को एक्सचेंज सेक्टर के लिए सकारात्मक संकेत मानता है, तो BSE को भी री-रेटिंग मिल सकती है। लेकिन अगर निवेशक BSE से पैसा निकालकर NSE में लगाते हैं, तो BSE पर दबाव बनेगा।
यह निर्णय अभी करने की ज़रूरत नहीं है। DRHP के बाद बाज़ार की प्रतिक्रिया देखें।
तीसरी स्थिति — आप IFCI जैसे परोक्ष NSE एक्सपोज़र वाले स्टॉक में हैं।
IFCI पहले ही 20 प्रतिशत उछल चुका है। यह मूव ज़्यादातर स्पेकुलेटिव है। IFCI का NSE में परोक्ष हिस्सा SHCIL के माध्यम से 4.4 प्रतिशत से कम है। NSE का 4.4 प्रतिशत — यानी करीब 22,000 करोड़ रुपये — IFCI के कुल बाज़ार पूंजीकरण से बड़ा है। लेकिन यह मूल्य IFCI के शेयर में सीधे नहीं आता।
अब सबसे बड़ा अनसुलझा सवाल — नियामक जोखिम।
SEBI उस एक्सचेंज की निगरानी करेगा जिसे उसने एक दशक तक लिस्ट नहीं होने दिया। को-लोकेशन मामले में 1,388 करोड़ का सेटलमेंट एक स्वीकृति नहीं, एक समझौता था।
DRHP में यह जोखिम किस भाषा में लिखा जाता है — वह आपकी असली परीक्षा होगी।
और एक व्यावहारिक विरोधाभास: NSE पर Nifty के डेरिवेटिव ट्रेड होते हैं। NSE लिस्ट होने के बाद NSE के अपने शेयर पर भी डेरिवेटिव बन सकते हैं। एक्सचेंज जो इंडेक्स चलाता है, उस पर खुद का डेरिवेटिव — यह भारतीय बाज़ार के लिए बिल्कुल नया प्रयोग होगा।
निष्कर्ष यह है कि NSE IPO ऐतिहासिक है — लेकिन ऐतिहासिक होना और निवेश के लिए उचित होना दो अलग बातें हैं।
DRHP का इंतज़ार करें। OFS संरचना का विश्लेषण करें। मूल्यांकन को BSE के P/E से जोड़कर देखें। तभी एक सूचित निर्णय संभव है।
जो निवेशक सिर्फ ऐतिहासिक उत्साह में भाग लेते हैं, उनके लिए IPO हमेशा एक नई कहानी होती है। जो DRHP पढ़ते हैं, उनके लिए यह एक संख्या है।
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