RBI 2.87 लाख Cr Transfer|Rupee बचाने वाला हाथ ही Rupee डुबो रहा है?

· NIFTY

जब Central Bank एक साथ Rupee का रक्षक और दबाव का स्रोत बन जाए

Reserve Bank of India के Central Board ने FY26 के लिए केंद्र सरकार को ₹2,86,588 करोड़ का अधिशेष हस्तांतरित करने का निर्णय लिया है। यह राशि भारतीय इतिहास में किसी एक वित्त वर्ष में RBI द्वारा सरकार को दिया गया सबसे बड़ा हस्तांतरण है।

उसी सप्ताह, RBI ने सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया कि वह Rupee की रक्षा के लिए ब्याज दरें नहीं बढ़ाएगा। नीति-निर्माताओं का तर्क यह है कि दर वृद्धि विकास को क्षति पहुँचाएगी जबकि मुद्रा को कोई ठोस स्थिरता नहीं देगी। मुद्रास्फीति नियंत्रण ही RBI की एकमात्र मौद्रिक प्राथमिकता बनी रहेगी।

ये दोनों निर्णय एक-दूसरे से स्वतंत्र नहीं हैं।

₹2.87 लाख करोड़ का यह हस्तांतरण सरकार की वित्तीय क्षमता को तत्काल विस्तार देता है। जब सरकार के पास अतिरिक्त नकदी आती है, तो बाज़ार से उधार लेने की उसकी आवश्यकता उसी अनुपात में घट जाती है। सरकारी उधारी की माँग घटने से दीर्घकालिक सरकारी बॉन्ड पर yield का दबाव कम होता है। भारत और अमेरिका के बीच ब्याज दर का अंतर — जो पहले से ही संकुचित हो रहा था — और सिकुड़ता है। यह वही अंतर है जो विदेशी निवेशकों को Rupee में निवेश रखने का प्रोत्साहन देता है।

जब यह differential घटता है, तो carry trade की आर्थिक तर्कसंगतता कमज़ोर पड़ती है। Carry traders — जो dollar उधार लेकर Rupee assets में निवेश करते हैं — अपनी positions को unwind करने लगते हैं। यह unwinding Rupee पर बिकवाली का दबाव उत्पन्न करती है, जो ठीक वही दिशा है जिसे RBI रोकना चाहता है।

तात्पर्य यह है कि RBI ने मौद्रिक माध्यम से Rupee की रक्षा का विकल्प त्यागा — किंतु वित्तीय माध्यम से एक ऐसा प्रवाह सक्रिय किया जो अप्रत्यक्ष रूप से उसी दबाव को पुनर्जीवित करता है।

₹2.87 लाख Cr का विरोधाभास — जो हाथ देता है, वही छीनता है

ऐतिहासिक संदर्भ महत्त्वपूर्ण है। 2013 के taper tantrum में भारत ने मौद्रिक और वित्तीय दोनों मोर्चों पर एक साथ कार्य किया था — RBI ने dollar deposit schemes के माध्यम से विदेशी पूँजी आकर्षित की और सरकार ने वित्तीय अनुशासन का संकेत दिया। उस समन्वय ने Rupee को स्थिर किया था। आज की स्थिति में मौद्रिक मोर्चा निष्क्रिय है और वित्तीय मोर्चा विस्तारवादी — यह 2013 का उल्टा संयोजन है।

किंतु यहाँ एक पूर्व-शर्त है जो पूरी गणना को बदल देती है।

₹2.87 लाख करोड़ का प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि यह राशि किस मद में व्यय होती है। यदि सरकार इसे पूँजीगत व्यय में — अवसंरचना, रक्षा, विनिर्माण — तैनात करती है, तो घरेलू विकास की गति बढ़ती है। उच्च growth premium दीर्घकालिक विदेशी निवेशकों को पुनः आकर्षित कर सकता है, जो carry traders की निकासी को आंशिक रूप से संतुलित करता है। इस परिदृश्य में RBI का हस्तांतरण और उसकी दर-स्थिरता एक साथ काम करती है — रक्षा की जगह विकास के माध्यम से Rupee को anchor करने की रणनीति।

Adani Enterprises और Adani Ports का इस वर्ष ₹1.3 लाख करोड़ का wealth creation इस परिदृश्य की अग्रिम स्थिति को संकेत देता है। Infrastructure-linked घरेलू पूँजी पहले से ही उस दिशा में स्थानांतरित हो रही है जहाँ सरकारी व्यय का प्रवाह अपेक्षित है — और यह आवागमन carry unwind से पहले हो रहा है, बाद में नहीं।

किंतु यदि सरकार इस राशि का अधिकांश भाग राजस्व व्यय में — सब्सिडी, हस्तांतरण भुगतान — लगाती है, तो वित्तीय गुणक निम्न रहेगा और मुद्रास्फीति पर दबाव बढ़ेगा। उस स्थिति में RBI का inflation mandate स्वयं चुनौती में आ जाएगा — और वह central bank जिसने Rupee की रक्षा के लिए दरें बढ़ाने से इनकार किया, मुद्रास्फीति के कारण दरें बढ़ाने पर विवश हो सकता है। यह वह feedback loop है जिसमें RBI के दोनों निर्णय एक-दूसरे को कमज़ोर करते हैं — और जो 2013 वाला समन्वय था, उसके विपरीत एक असमन्वित चक्र बनता है।

बाज़ार अभी इस अंतर्विरोध को पूरी तरह price नहीं कर रहा।

आगे का रास्ता — Growth Premium या Inflation Trap?

Sensex इस सप्ताह 75,415 पर बंद हुआ, Nifty 50 ने 23,719 का स्तर छुआ। Banking stocks ने नेतृत्व किया। यह surface stability उस नीतिगत तनाव को नहीं दर्शाती जो RBI के दो निर्णयों के बीच आकार ले रही है।

असल परीक्षण Union Budget के पूँजीगत व्यय आँकड़ों में होगा। यदि ₹2.87 लाख करोड़ की अधिकांश राशि capex में तैनात होती है, तो bond yield पर दबाव सीमित रहेगा और carry differential उतना नहीं सिकुड़ेगा। Rupee पर दबाव प्रबंधनीय बना रहेगा और RBI की दोहरी रणनीति — मौद्रिक निष्क्रियता plus वित्तीय विस्तार — एक coherent framework बन जाएगी।

यदि इसके विपरीत, revenue expenditure का अनुपात बढ़ता है, तो 10-year government bond yield का स्तर निर्णायक होगा। यदि yield 7% से नीचे आती है, तो India-US rate differential इतना संकुचित हो जाएगा कि carry unwind की गति तेज़ होगी — और Rupee एक बार फिर 96 के पार जाने का दबाव झेल सकता है।

RBI Governor Sanjay Malhotra ने जो संकेत दिया है वह यह है कि inflation management मौद्रिक नीति का केंद्र रहेगा। किंतु यह संकेत तब तक पर्याप्त नहीं है जब तक fiscal deployment का स्वरूप स्पष्ट नहीं हो जाता। जो निवेशक केवल rate pause को Rupee-positive मान रहे हैं, वे उस fiscal channel को अनदेखा कर रहे हैं जो RBI ने स्वयं खोला है।

₹2.87 लाख करोड़ अब सरकार के हाथ में है। अगला संकेत वहाँ से आएगा — और वह संकेत तय करेगा कि RBI का यह दाँव Rupee को anchor करता है या उसे उस pressure में धकेलता है जिसे रोकने के लिए दरें बढ़ाने से इनकार किया गया था।

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