Rupee Hits Record 95.74 Despite Gold Duty Hike|What Is Still Pulling Capital Out?

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आज का बाज़ार: चार दिनों की गिरावट और एक नई रिकॉर्ड कमज़ोरी

बुधवार को भारतीय बाज़ार में राहत की उम्मीद थी — सरकार ने सोमवार को सोने पर आयात शुल्क 10% से बढ़ाकर 15% कर दिया था, और यह कदम सीधे तौर पर रुपये को सहारा देने के लिए उठाया गया था। लेकिन जब बाज़ार बंद हुआ, तब रुपया 95.74 प्रति डॉलर पर था — अब तक का सबसे निचला स्तर।

Nifty लगातार चौथे दिन लुढ़का। Sensex भी नकारात्मक दायरे में बंद हुआ। ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बना रहा, जो अमेरिका-ईरान युद्ध और होर्मुज़ जलडमरूमध्य में व्यवधान की आशंका से उपजा दबाव था। आर्थिक विश्लेषकों ने इस सत्र के बारे में जो लिखा, वह था — "कच्चे तेल की कीमतें और रुपये की कमज़ोरी बाज़ार को दबाए हुए हैं।" लेकिन यह पर्याप्त स्पष्टीकरण नहीं है।

Bharti Airtel ने Q4 में मुनाफ़ा 34% घटने की रिपोर्ट दी, जबकि राजस्व 16% बढ़ा — एक ऐसा विभाजन जिसने बाज़ार को असमंजस में डाला। Tata Motors के वाणिज्यिक वाहन विभाग का मुनाफ़ा 70% उछला, फिर भी समग्र धारणा कमज़ोर रही। Tata Power का शेयर सत्र में 7% गिरा — FY26 में रिकॉर्ड वार्षिक मुनाफ़े के बावजूद। सेक्टर दर सेक्टर, कमाई के आंकड़े बाज़ार को ऊपर खींचने में नाकाम रहे।

इन सबके बीच एक धागा जो हर सेक्टर से गुज़रता दिखा, वह था रुपये की कमज़ोरी। लेकिन जिस नीति को रुपये की ढाल बनाने के लिए लागू किया गया था, वह काम नहीं आई — और यही वह सवाल है जो आज के पूरे बाज़ार को एक अलग रोशनी में देखने पर मजबूर करता है।

सोने पर शुल्क बढ़ा, रुपया और गिरा — तंत्र क्यों उलटा पड़ा?

सरकार का तर्क सीधा था: सोने का आयात भारत के चालू खाते के घाटे का सबसे बड़ा गैर-ज़रूरी हिस्सा है। शुल्क बढ़ाओ, आयात घटेगा, डॉलर की मांग घटेगी, रुपया संभलेगा। यह तर्क 2013 में भी लगाया गया था — जब तत्कालीन सरकार ने सोने पर शुल्क 2% से बढ़ाकर 10% किया था। उस वक़्त भी रुपया 68 प्रति डॉलर से नीचे चला गया था, और सोने की तस्करी का ग्राफ़ तेज़ी से चढ़ा था।

आज 2026 में, Senco Gold के MD सुवंकर सेन ने खुद कहा — ड्यूटी हाइक कम से कम एक साल तक रह सकती है, और इसका सबसे बड़ा असर बड़े ज्वैलर्स पर पड़ेगा। Jefferies ने चेतावनी दी कि ड्यूटी हाइक से तस्करी बढ़ेगी — जो डॉलर की मांग को अनौपचारिक रास्तों से और बढ़ाती है। Titan, Kalyan Jewellers और Senco Gold के शेयर दो दिनों में 11–15% गिर चुके थे, जिससे बाज़ार पूंजीकरण में ₹50,000 करोड़ की चपत लग चुकी थी।

लेकिन रुपये पर जो असली दबाव था, वह सोने से नहीं आ रहा था। विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की निरंतर बिकवाली, ऊंचे कच्चे तेल के दाम जो भारत के ऊर्जा आयात बिल को फुलाते हैं, और आयातकों की हेजिंग मांग — यह तीनों मिलकर रुपये को खींच रहे थे। सोने की ड्यूटी हाइक ने केवल एक छोटे चैनल को संकुचित किया, जबकि बाकी तीन चैनल पूरी तरह खुले थे।

यहाँ वह बिंदु है जहाँ तस्वीर और जटिल हो जाती है: अगर कच्चे तेल की कीमतें और FII आउटफ्लो ही असली कारण हैं, तो रुपये को स्थिर करने के लिए जो नीति चुनी गई — वह समस्या की जड़ से नहीं जुड़ती।

आगे का रास्ता: RBI की हस्तक्षेप सीमा और वह थ्रेशोल्ड जो रुपये का रुख तय करेगा

वह अनसुलझा सवाल जो परत-दर-परत सामने आता रहा — क्या RBI के पास इस गिरावट को रोकने के लिए पर्याप्त ज़मीन है? — अब सीधे तौर पर आंकड़ों की परीक्षा मांगता है।

भारत का विदेशी मुद्रा भंडार अभी लगभग $640 अरब के आसपास है। यह बफ़र 2013 की तुलना में कहीं अधिक मजबूत है, जब भंडार $275 अरब था। लेकिन ब्रेंट क्रूड अगर 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर तीन महीने से अधिक बना रहा, तो भारत का तेल आयात बिल हर महीने अरबों डॉलर की अतिरिक्त निकासी करता रहेगा। वह $640 अरब का बफ़र तेज़ी से खर्च हो सकता है — और RBI उसे बचाने के लिए लगातार हस्तक्षेप नहीं कर सकता।

2013 का समानांतर यहाँ एक शर्त के साथ लागू होता है: उस वक़्त भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर पहले ही धीमी पड़ रही थी, और रुपये की 20% गिरावट ने मुद्रास्फीति को भड़का दिया था। आज विकास दर अभी भी 6%+ के ऊपर है, लेकिन अर्थशास्त्रियों ने पूर्वानुमान घटाना शुरू कर दिया है। अगर रुपया 97–98 के स्तर पर पहुँचता है, तो आयातित मुद्रास्फीति RBI को ब्याज दर कटौती के रास्ते से हटने पर मजबूर कर सकती है — जो अभी शेयर बाज़ार के लिए एकमात्र बड़ी उम्मीद बची है।

रुपये के स्थिरीकरण की दिशा में झुकाव तब बनेगा, जब ब्रेंट क्रूड 95 डॉलर से नीचे आए और FII आउटफ्लो का साप्ताहिक औसत घटे। लेकिन अगर होर्मुज़ संकट और गहरा हुआ — या अमेरिका-ईरान वार्ता टूटी — तो 95.74 का रिकॉर्ड लो जल्द ही केवल एक पड़ाव बनकर रह जाएगा, मंज़िल नहीं।

कल का सबसे ज़रूरी बेंचमार्क यह है: USD/INR क्या 95.50 से ऊपर बंद होता है — अगर हाँ, तो RBI की खरीदारी की सीमा परख होगी। और अगर Nifty का पाँचवाँ नकारात्मक सत्र आया, तो वह निवेशकों से वह सवाल पूछेगा जिसे आज टाला गया: क्या सोने की ड्यूटी हाइक केवल एक संकेत था — कि सरकार खुद रुपये की गिरावट को लेकर चिंतित है?

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